Skip to main content

बेहतर होगा

Submitted by Sukant Kumar on

जिस समाज में

एक,

विद्यार्थी, विद्या से,

नौकर, अपनी नौकरी से,

मरीज़, डॉक्टर से,

शरीफ, पुलिस से,

बेक़सूर, अदालत से,

वोटर, नेता से,

ईमानदार, पूरे सिस्टम से,

डरता है।

 

जहां हर कोई भगवान से डरता हो,

नशा

Submitted by Sukant Kumar on

वो काम अधूरा रह गया,

जिसे पूरा करने का वक़्त नहीं मिला।

 

वो काम बेहद ज़रूरी होगा,

क्योंकि समय से ज़्यादा, 

उसे साँसों की ज़रूरत थी।

 

वो काम था, जिसमें मन कभी नहीं लगता,

उसका नाम मात्र ही काफ़ी है,

मन-तन-बदन में दर्द उठाने को,

तराज़ू

Submitted by Sukant Kumar on

बिक जाना तो लाज़मी है,

इस मुकम्मल जहान में,

यहाँ तो संतों और फ़क़ीरों कि,

भी नीलामी होती है,

ख़याल बस इतना रहे,

अपनी क़ीमत को,

अपने जीवन की खुमारी,

और ख़ुशियों की गठरी से,

किसी तराज़ू पर तौल लें,

अपनी क़ीमत को पहचान,

पूर्ण तसल्ली के बाद ही,

इक फ़लसफ़ा

Submitted by Sukant Kumar on

सबको “भगवान” की तलाश थी,

सब अपने-अपने सफ़र पर निकले।

 

कुछ को मिले,

वे ज्ञान बाँट रहे हैं।

 

कुछ को आभास हुआ,

वे शांति से अपना काम कर रहे हैं।

 

बाक़ी को भ्रम-मात्र है,

वे बस कर्मकांड निभा रहे हैं।

सवाल ही तो है….

Submitted by Sukant Kumar on

कितना सरल है ये जताना कि - “मेरे बच्चे! मैं तुमसे प्यार करता हूँ”?

फिर भी ना जाने क्यों हम अपने ही बच्चे को ही सताये चले जा रहे हैं? 

 

कितना आसान है ये समझना कि हमें “सच” का साथ देना चाहिए? 

फिर क्यों हम झुठ का साथ निभाये चले जा रहे हैं?

 

कितना मुश्किल है ये देखना की “बेईमानी और चोरी” से कभी किसी का भला नहीं हुआ?

जीवन गणित

Submitted by Sukant Kumar on

सुना है अक्सर लोगों को कहते,

कभी तो वक़्त बुरा है,

कभी क़िस्मत बुरी है,

कभी दुनिया बुरी है,

तो कभी नसीब खोटा है।

 

क्यों वे लोग नहीं कहते -

बुरा ही सही, ये वक़्त मेरा है,

फूटी ही सही, क़िस्मत ये मेरी है,

छोटी ही सही, ये दुनिया भी मेरी है,

कहानी

Submitted by Sukant Kumar on

क़िस्से बदल जाते हैं,

कहानियाँ नहीं बदलती।

 

किरदार बदल जाते हैं,

उनकी फ़ितरत नहीं बदलती।

 

हालात बदल जाते हैं,

परिस्थितियाँ नहीं बदलती।

 

हर साल मंजर बदल जाते हैं,

उनकी ख़ुशबू नहीं बदलती।

 

मैं प्रधानमंत्री बनना चाहता हूँ!

Submitted by Sukant Kumar on
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होते हुए भी हम कितने असहाय हैं, अपने जीवन में सही अभिव्यक्ति को तलाशने में। हम जब कहना चाहते हैं - क्यों नहीं हो पाएगा.. हमारी अभिव्यक्ति में कहीं छिपा होता है - ये नहीं हो पाएगा। हम ख़ुद को जब अभिव्यक्त कर पाने में सक्षम नहीं तो कैसे हम लोकतंत्र को समझ पायेंगे? कैसे वोट कर चुन पायेंगे अपनों को जो हम लोगों के लिये काम कर पाये? Democracy में demoशोध लोगों के लिए था, भारत पहुँचते पहुँचते वो लोकतंत्र हो गया। लोक की सीमा नहीं है, पूरा संसार ही नहीं, उसके परे की भी सलतनत इस परिभाषा में शामिल है - इहलोक भी और परलोक भी। तभी तो मंदिर और मस्जिद के नाम पर वोट करते हैं हम, परलोक के भरोसे। Democracy के लिए हिन्दी में सही शब्द “लोगतंत्र” होना चाहिए था, मेरी समझ से। वैसे लोक ज़्यादा उचित है क्योंकि उसमें इंसान ही नहीं पशु पक्षी भी शामिल किए जा सकते हैं, परियावरण भी। पर ये तभी हो पाएगा जब लोगतंत्र स्थापित हो जाये तब अगला पड़ाव लोकतंत्र का हो सकता है। जब बात विस्तार की आये, तब। जब ज्ञान अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच जाये, तब। और ये तब हो पाएगा जब हम जीवन का अर्थ यानी मतलब और अर्थ यानी मूल्य को समझ पायेंगे।

आगे क्या?

Submitted by Sukant Kumar on
लगभग २० वर्षों के बाद आज भी वही सवाल सामने है - आगे क्या? आज भी वही जवाब है - नहीं पता। आपके पास अगर कोई सुझाव हो तो बतायें। दूसरों की नज़र में तो ख़ुद को असफल देखता ही आया हूँ, आदत सी हो गई है। पर अब तो अपनी नज़रों में भी असफलता का चश्मा पहने घूमता हूँ। माँ पिता की मेहनत और ईमानदारी से कमाई संपत्ति भी बेवजह खर्च करता आया हूँ। आज भी कर रहा हूँ। अब तो मैं ही नहीं मेरे बच्चे की परवरिश की ज़िम्मेदारी उनके माथे पर है। शर्मिंदा हूँ, और असमर्थ भी। लौट कर किसी कंपनी में जूनियर इंजीनियर की तरह काम करने की ना हिम्मत बची है, ना चाहत। हाँ ज़रूरत सी ज़रूर जान पड़ती है। लगभग २० वर्षों के बाद आज भी वही सवाल सामने है - आगे क्या?

संतोषम परम सुखम

Submitted by Sukant Kumar on
संतोष का व्यावहारिक अर्थ है - जितना है उस पर नाज़ करो, अहंकार नहीं, उसके बाद ही अतिरिक्त की कामना करो। बिना कामना के कोई ज़रूरत नहीं होती! और बिना ज़रूरत के इंसान कोई काम नहीं करता!

Podcasts