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कुछ राजनैतिक समस्यायें

Submitted by Sukant Kumar on
कौन सी ऐसी सामाजिक समस्या है, जिसका निदान तंत्र नहीं कर सकता है? पर इस लोक की समस्या ही तो यही है कि तंत्र ख़ुद ही एक समस्या बन चुका है और लोक उस समस्या की अग्नि में उधार लेकर घी डाल रहा ह। जो आग एक-न-एक दिन उसका घर ही जला डालेगी। लोक तो बस जलने का इंतज़ार करता प्रतीत होता है। हालत तो ऐसी है कि देश में ना मौजूदा प्रशासन और ना ही वर्तमान राजनीति को लोक या जनता की ज़रूरत है। इनकम टैक्स से लेकर टोल टैक्स तक सीधे जनता के खाते से तंत्र के खाते में पहुँच रहा है। आज कोई असहयोग आंदोलन की कल्पना तक नहीं कर सकता है। जो चालक हैं, वो इतिहास से सत्ता सुख भोगने का नुस्ख़ा निकाल ही लेते हैं। मेरी समझ से तो मौजूदा समाज में लोकतंत्र भी आभासी या वर्चुअल जो चुका है। जैसे, सोशल मीडिया पर हम अभिव्यक्ति की आज़ादी तलाश रहे हैं! कहीं कुछ होता है, हम शोक मनाने लगते हैं, या जश्न! अर्थशास्त्र के नाम पर लोक बस चंदा दे रहा है, तंत्र बटोर रहा है, और हम तमाशा देख रहे हैं। प्राइवेट सेक्टर को तो आपकी या मेरी, या हमारे बच्चों की कभी चिंता थी ही नहीं। इसलिए तो तंत्र तानाशाह बन गया है।

कुछ सामाजिक समस्यायें

Submitted by Sukant Kumar on
फलों के मुख्यतः तीन प्रकार हैं - जाति, आयु और भोग। ये फल हमें हमारे कर्मों के अनुरूप मिलते हैं। जाति द्वारा हमारे जन्मों का निर्धारण होता है। आयु से यहाँ सिर्फ़ हमारी उम्र का ही निर्धारण नहीं होता है, बल्कि हमारे फलों की आयु का भी निर्धारण होता है, अर्थात् जो फल हम भोग रहे हैं, वो हम कितनी देर तक भोगेंगे, दुख ज़्यादा होगा या सुख, इसका निर्धारण भी आयु से होता है। भोग का सीधा संबंध हमारी क्रियाएं, अनुभूतियाँ और परिणाम से है, सुख-दुःख, लाभ-हानि, भोग-रोग आदि।

मेरी पारिवारिक समस्यायें

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विज्ञान भी मानता है कि हमारा शरीर उन्हें पाँच तत्वों को मानता है, जिसे भारतीय दर्शन में पंचमहाभूत माना गया है - आकाश (Space) , वायु (Quark), अग्नि (Energy), जल (Force) तथा पृथ्वी (Matter)। रट्टा मारकर इन बच्चों का क्या भला हो जाएगा? किसी तरह यह बच्चे प्रधानमंत्री या न्यायाधीश भी बन गये तो जीवन के ख़िलाफ़ ही अपना फ़ैसला सुनायेंगे। जीवन को समझकर ही तो मेरे बच्चे समाज में अपना योगदान दे पायेंगे। वरना मेरी ही तरह वे भी नालायक ही रह जाएँगे। वे किसान बनेंगे या कलेक्टर यह तो वे ही तय करेंगे। मेरा मक़सद तो उन्हें अधिकतम आजीविका और पहचान को नकारने का अवसर देना है, जैसा चाहे-अनचाहे मुझे मेरे माता-पिता ने दिया है, या समाज से मैंने छीनकर लिया है। शिक्षा-व्यवस्था को भी कुछ ऐसे ही मौक़े के चुनाव को ज्ञान-पूर्ण तरीक़े से हर छात्र को देना चाहिए। पर इसमें खर्च लगेगा, सुना है लोक राजा है, और राजा के पास किस बात की कमी है? अच्छी शिक्षा मिलेगी, तभी तो ये बच्चे ईमानदारी से ख़ुद को पहचानकर सृजनात्मक और रचनात्मक ढंग से समाज में अपना योगदान दे पायेंगे। यह मेरी पारिवारिक समस्या भी है, जहां से मेरी सामाजिक समस्या भी शुरू होती है।

मेरी आर्थिक समस्यायें

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जीवन का अर्थ तो आनंद की मात्रा और उसकी गुणवत्ता ही तय करती है। आनंद तो ज्ञान के रास्ते ही मिल सकता है। यह रास्ता किसी के लिए निर्धारित नहीं है, यहीं हम अपने इच्छा-स्वातंत्र्य का प्रयोग करते हैं। यही चुनाव हमारे जीवन के अर्थों का मापदंड है। राम और रावण दोनों ही ज्ञानी थे, उनमें अंतर तो आनंद का ही था। रावण में जो महत्त्वाभिलाषा थी, भोग-विलास की जो लोलुपता थी, उसकी जो शारीरिक हवस थी, जिसके लिए उन्होंने सीता का अपहरण किया था, वह उस ज्ञानी को अभिमानी बना देती है। रावण हमारे अहंकार और घमंड का प्रतीक है। राम अपनी मर्यादा के लिए जाने जाते हैं। उनमें ईमानदारी है, आत्मसम्मान है, स्वाभिमान है। राम और रावण दोनों ही हमारे अंदर हैं, हमें तो बस हर पल चुनाव करना है। यही चुनाव हमारे अस्तित्व को हर क्षण अर्थ देता है। एक पल में जो राम थे, वही अगले क्षण रावण का किरदार निभा सकते हैं।

मेरी मनोवैज्ञानिक समस्यायें

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मेरी दो प्रमुख मनोवैज्ञानिक समस्या है। पहला नशा है। मैं कई तरह के नशे का सेवन करता आया हूँ। तंबाकू से शुरू करते हुए मैं शराब तक पहुँच, जहां से ड्रग्स के रास्ता भी कुछ दूर चल चुका हूँ। संभोग एक शारीरिक समस्या तो बाद में है, वह पहले तो यह एक मानसिक उलझन है। नशे से उत्तपन्न भ्रम और संशय ने मेरी चेतना को अज्ञानता के कुचक्र में रहने को मजबूर कर दिया है। हर प्रकार की शारीरिक कमजोरी से लेकर कैंसर तक का सफ़र मैंने अपनी कल्पनाओं में कई बार तय किया है।

मेरी व्यक्तिगत समस्यायें

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वनस्पति या पशु जीवन को हमारी ज़रूरत नहीं है, पर हमें हर प्रकार के जीवन की ज़रूरत जान पड़ती है। आख़िर ख़ाना जो आवश्यक त्रय का हिस्सा है, जिसकी पूर्ति तो अन्य जीवन के स्रोतों से ही हमें प्राप्त होती हैं, चाहे हम शाकाहारी हों, या मांसाहारी। अंतर तो सिर्फ़ भावनात्मक स्तर पर होता है, जो Mid-Brain पर आधारित है। आवश्यक त्रय से जुड़ी हर संभावनाओं के लिए हमारा Old-Brain सक्रिय होता है, जिसके अन्तर्गत ख़ाना, संभोग और ख़तरा आता है। इन्हीं तीन पयमानों पर मैं अपनी व्यक्तिगत समस्याओं को समझने की कोशिश करूँगा।

मेरी वर्तमान समस्यायें

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भारतीय दर्शन के अनुसार हमारे दुखों के तीन मुख्य स्रोत हैं - आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक! हर इंसान का जीवन सुख और दुख के बीच झूलता रहता है। सुख तो भोगने की चीज है। इसलिए, सुख के कारण पर चिंतन करने की ज़रूरत शायद ही किसी ने ज़रूरी समझी होगी। मैंने भी कभी अपने सुख ओर सवाल नहीं किए हैं। मैं भी अपने दुख को लेकर ही चिंतित रहता हूँ।

मेरा शोध-प्रस्ताव 

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अपने लेखन-परियोजना के दूसरे खंड - "आगे क्या?" पर मैंने काम करना शुरू किया। पर क़रीब 9 अध्याय लिखने के बाद, मुझे अपने लेखन से संतुष्टि नहीं मिली। इसमें सुधार करने की हिम्मत नहीं है। सुधार करने से आसान, मुझे नयी शुरुवात करना ज़्यादा उचित लगा। नौवाँ अध्याय पूरा नहीं हो पाया, अधूरा ही है, शायद ही पूरा हो। पर इसी क़िस्से को एक नये अन्दाज़ में फिर से लिखूँगा।

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